Arya Samaj - An Introduction

आर्य समाज क्या है?

आर्य समाज का अर्थ है, श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों को धारण करने वाले स्त्री-पुरुषों का समूह।

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने 10 अप्रैल 1875 ई. को मुम्बई का काकड़वाड़ी उपनगर में सर्वप्रथम आर्यसमाज की स्थापना की थी। आज संसार के हर देश के निवासी आर्यसमाज की विचारधारा को अपना रहे हैं।

आर्यसमाज का उद्देश्य: वेदों में बताये गये मानव मात्र के कल्याणकारी सिद्धान्तों के द्वारा बिना किसी भेद भाव के मानव समाज के दुःखों को दूर करने का प्रयत्न करना। आर्यसमाज तीन तत्त्वों को अनादि मानता है,जो न कभी उत्पन्न होते हैं और न कभी नष्ट होते हैं।

ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति.

ईश्वर: – सत्-चित्त-आनन्द स्वरूप,सर्वशक्तिमान एवं सर्वव्यापी है। वही एक उपासना करने योग्य है।

जीवात्मा- अनेक हैं जो कर्म करने में स्वतन्त्र और कर्मों का फल भोगने में परतन्त्र हैं। जीवात्मा ईश्वर की   उपासना से दुःखों से मुक्त हो जाता है।

 

प्रक्रति अचेतन(जड़) है। यह प्रक्रति, सृष्टि के रूप में ईश्वर की व्यवस्था से बनती एवं बिगड़ती रहती है।

आर्य समाज की मान्यताओं का आधार चार वेद एवं वेदों के अनुकूल ऋषियों द्वारा लिखा गया साहित्य है। ऋगवेद्,यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, इन चारों वेदों का ज्ञान ईश्वर ने सृष्टि के आदि में, क्रमशः अग्नि ऋषि,वायु ऋषि, आदित्य ऋषि और अङ्गिरा ऋषि के हृदयों में दिया था। इसी कारण वेदों में किसी देश विशेष,काल,जाति आदि का उल्लेख नहीं है। वेदों में न केवल मानव मात्र अपितु प्राणी मात्र के कल्याण के सिद्धान्त दिये गये हैं। वेदों को पढ़ने का मानव मात्र को अधिकार है।

  1. आर्य समाज उन सभी महापुरुषों को अपना आदर्श मानता है जिन्होंने वेदों का अध्ययन करके अपना तथा मानव मात्र का कल्याण किया। जैसे भगवान् शङ्कर,भगवान् श्री राम, भगवान् श्री कृष्ण आदि।

  2. आर्य समाज जन्म के आधार पर किसी को छोटा-बड़ा, ऊँच-नींच नहीं मानता है और न छुआछूत मानता है। अपितु अच्छे बुरे आचरण के आधार पर मनुष्यों को छोटा-बड़ा मानता है।

Ten Principles of Arya Samaj

1. सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदि मूल परमेश्वर है।

2. ईश्वर सच्चिदानन्द – स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर,     सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्त्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है।

3. वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है।वेद का पढऩा – पढ़ाना और सुनना – सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।

4. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडऩे में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये।

5. सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहियें।

6. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।

7. सबसे प्रीति – पूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिये।

8. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।

9. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट न रहना चाहिए, किन्तु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।

10. सब मनुष्यों को सामाजिक सर्व – हितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिये, और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतन्त्र रहें।